: भिलाई स्टील प्लांट : तीसरी और दूसरी पीढ़ी के कार्मिकों ने SAIL स्तरीय मंच पर अपनी योग्यता दिखाई
Admin Tue, Apr 16, 2024
भिलाई स्टील प्लांट : तीसरी और दूसरी पीढ़ी के कार्मिकों ने SAIL स्तरीय मंच पर अपनी योग्यता दिखाई
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तीसरी पीढ़ी के दो अधिकारी और दूसरी पीढ़ी के एक अधिकारी ने इस वर्ष सेल सीटीवाईएम प्रतियोगिता में सफल हो भिलाई का नाम रोशन किया
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भिलाई और भिलाईवासियों को जो दूसरों से अलग और अद्भुत छवि बनती है, वह है उनकी करुणा, प्रेम और अपनेपन की भावना। वे सबको स्वीकार करते हैं, सबको अपनाते हैं और आसानी से संगठित होकर एक समुदाय में बंध जाते हैं। भिलाईवासी एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखते और सिखाते हैं, एक दूसरे के विकास में आपसी सहयोग करते हैं। जितना संभव हो सके एक-दूसरे का साथ देते हैं। भिलाई बिरादरी का यह जुड़ाव हर किसी की जिंदगी से जुड़ा हुआ है सेल……, कुछ इस तरह से नज़र आता है।
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समय बदल रहा है। नई पीढ़ी का आकर्षण बड़े शहरों की ओर निश्चित रूप से बढ़ रहा है। लेकिन नई पीढ़ी के बहुत से लोग अभी भी इस्पात नगरी में मौजूद हैं और एक ऐसे संगठन में सक्रिय है। जिस संगठन में कभी उनके परिवार के अग्रज कार्य करते थे। ऐसे संगठन का प्रतिनिधित्व करना बहुत गर्व की बात है, जहां उनके माता-पिता और यहां तक कि उनके दादा-दादी ने अपने पूरा जीवन और कार्यसेवा उसी संगठन में बिताई हो। दूसरी और तीसरीपीढ़ी के सदस्यों की उसी संगठन में भागीदारी, वफादारी और विश्वास को दर्शाता है। इस शहर पर सेल के प्रभाव का यही स्तर बना हुआ है।
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सेल प्रतिवर्ष 45 वर्ष या उससे कम उम्र के सभी युवा प्रबंधकों के लिए चेयरमैन्स ट्रॉफी फॉर यंग मैनेजर्स (सीटीवायएम) आयोजित करता है। इस वर्ष, न केवल बीएसपी की युवा टीम ने प्रतिष्ठित ट्रॉफी और सम्मान प्राप्त किया है, बल्कि टीम के सभी सदस्य एक सामान्य किन्तु विषेष पहलू को उजागर करते हैं, जो सम्मान के गौरव को कई गुना बढ़ा देता है और वो यह है कि ये सभी सदस्य “मेड इन सेल” हैं।
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सोनल श्रीवास्तव, जो वर्तमान में आरसीएल में प्रबंधक पद पर कार्यरत हैं और ये भिलाई इस्पात संयंत्र में शामिल होने वाली तीसरी पीढ़ी के सदस्य हैं। श्री सोनल श्रीवास्तव कहते हैं कि “मैं अपने दादाजी से कभी नहीं मिला, उनकी मृत्यु जल्दी हो गई थी, लेकिन उनके संस्मरण आज भी हमें गौरवान्वित करते हैं”। सोनल के दादा जी ने बीएचयू से मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया था। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वह टाटा प्रोजेक्ट्स में शामिल हो गए थे, लेकिन नियति को तो कुछऔर ही मंजूर था। टाटा में अपने दो साल का कार्यकाल पूर्ण करने के बाद, वह बेहतर संभावनाओं के लिए मुंबई जा रहे थे, लेकिन यात्रा के बीच में ही वह एक ऐसी जगह पर रुके जो चारों ओर तंबू से घिरा हुआ था। जैसे ही वह स्टेशन से बाहर निकले, उनके पास एक नौकरी थी, जो तब अंजान भिलाई इस्पात संयंत्र की नौकरी थी। वह फाउंड्री और फोर्ज शॉप में शामिल हुए और उनकी उपलब्धि के लिए उन्हें 1971 में ‘मेटलर्जिस्ट ऑफ द ईयर’ सम्मान से सम्मानित किया गया।
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सोनल श्रीवास्तव ने कहा कि मेरे पिता भिलाई में पैदा हुए, यहीं पले-बढ़े और भिलाई विद्यालय में स्कूली शिक्षा प्राप्त कर, भिलाई इस्पात संयंत्र में सेवा देने वाले दूसरी पीढ़ी के कर्मचारी बने। इस संगठन में 39 साल की सेवा के बाद, वह ढेर सारी अच्छी यादों और गर्व की भावना के साथ, पिछले साल ही मर्चेंट मिल विभाग से सेवानिवृत्त हुए हैं।
श्री सोनल बताते हैं कि तीसरी पीढ़ी का सेल कर्मचारी होने के नाते, मैंने अपना मिडिल स्कूल बीएसपी ईएमएमएस-5 से और अपना हाई स्कूल बीएसपी के एसएसएस-10 से पूरा किया। एनआईटी रायपुर से मेटलर्जी में अपनी इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद, मैं वर्ष 2014 में सेल की कार्यसेवा में शामिल हो गया। एक कर्मचारी के रूप में भले ही अब तक मैंने यहाँ एक दशक ही बिताया हो, पर बीएसपी के साथ और सहयोग के कारण सेल हमेशा ही मेरे अस्तित्व का अभिन्न अंग रहा है।तीसरी पीढ़ी के एक और कर्मचारी और सीटीवाईएम के विजेता सदस्य सिद्धार्थ रॉय, वर्ष 2015 में भिलाई इस्पात संयंत्र में शामिल हुए और वर्तमान में ब्लास्ट फर्नेस-8 (ऑपरेशन) में प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं।
सिद्धार्थ रॉय का कहना है कि “सेल मेरे लिए नया नहीं है, बल्कि मेरे जीवन का एक हिस्सा है”। इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई और यहाँ की कड़ी मेहनत, ईमानदारी और बुद्धिमत्ता की मशाल आने वाली पीढ़ियों तक
भी पहुँची है। सेल में कार्य करने वालों में सबसे पहले मेरे दादाजी थे – एक साधारण दूरदर्शी व्यक्ति थे। उन्होंने न केवल अपना पैतृक घर और इस्को इस्पात संयंत्र (पूर्व में कुल्टी, पश्चिम बंगाल में स्थित) में नौकरी छोड़ दी, बल्कि अन्य लोगों को भी एक अविकसित, नई जगह पर जाने और वहां रहने के लिए मना लिया और वो सभी भिलाई चले आए। उन दिनों, भिलाई इस्पात संयंत्र एक मिलियन टन प्रतिवर्ष उत्पाउन क्षमता वाला संयंत्र था। अभी नया सेटअप होने के कारण, पूर्व सोवियत संघ (यूएसएसआर) टेक्नोलॉजी को आवश्यक रूप से सीखना सबसे महत्वपूर्ण होने के साथ साथ यहां के प्रत्येक कर्मचारियों का प्राथमिक उद्देश्य बन गया था। कंपनी विकसित हुई, उसके साथसे सीखना सबसे महत्वपूर्ण होने के साथ साथ यहां के प्रत्येक कर्मचारियों का प्राथमिक उद्देश्य बन गया था। कंपनी विकसित हुई, उसके साथ ही लोगों ने विकास किया और इस्पात श्रमिकों की पहली पीढ़ी धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। फिर मेरे पिता, वर्ष 1980 के दशक के मध्य में सेल में शामिल हुए। वह एक ऐसा समय था जब हमारा परिवार ‘ग्रोथ’ कर रहा था। संयंत्र की क्षमता पहले ही 2.5 मिलिटन टन प्रतिवर्ष तक बढ़ा दी गई, जो उस समय एक उल्लेखनीय और तकनीकी रूप से आष्चर्यजनक उपलब्धि थी। अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी वाली प्लेट मिल देखने लायक थी।
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तीसरी पीढ़ी के दो अधिकारी और दूसरी पीढ़ी के एक अधिकारी ने इस वर्ष सेल सीटीवाईएम प्रतियोगिता में सफल हो भिलाई का नाम रोशन किया
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भिलाई और भिलाईवासियों को जो दूसरों से अलग और अद्भुत छवि बनती है, वह है उनकी करुणा, प्रेम और अपनेपन की भावना। वे सबको स्वीकार करते हैं, सबको अपनाते हैं और आसानी से संगठित होकर एक समुदाय में बंध जाते हैं। भिलाईवासी एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखते और सिखाते हैं, एक दूसरे के विकास में आपसी सहयोग करते हैं। जितना संभव हो सके एक-दूसरे का साथ देते हैं। भिलाई बिरादरी का यह जुड़ाव हर किसी की जिंदगी से जुड़ा हुआ है सेल……, कुछ इस तरह से नज़र आता है।
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समय बदल रहा है। नई पीढ़ी का आकर्षण बड़े शहरों की ओर निश्चित रूप से बढ़ रहा है। लेकिन नई पीढ़ी के बहुत से लोग अभी भी इस्पात नगरी में मौजूद हैं और एक ऐसे संगठन में सक्रिय है। जिस संगठन में कभी उनके परिवार के अग्रज कार्य करते थे। ऐसे संगठन का प्रतिनिधित्व करना बहुत गर्व की बात है, जहां उनके माता-पिता और यहां तक कि उनके दादा-दादी ने अपने पूरा जीवन और कार्यसेवा उसी संगठन में बिताई हो। दूसरी और तीसरीपीढ़ी के सदस्यों की उसी संगठन में भागीदारी, वफादारी और विश्वास को दर्शाता है। इस शहर पर सेल के प्रभाव का यही स्तर बना हुआ है।
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सेल प्रतिवर्ष 45 वर्ष या उससे कम उम्र के सभी युवा प्रबंधकों के लिए चेयरमैन्स ट्रॉफी फॉर यंग मैनेजर्स (सीटीवायएम) आयोजित करता है। इस वर्ष, न केवल बीएसपी की युवा टीम ने प्रतिष्ठित ट्रॉफी और सम्मान प्राप्त किया है, बल्कि टीम के सभी सदस्य एक सामान्य किन्तु विषेष पहलू को उजागर करते हैं, जो सम्मान के गौरव को कई गुना बढ़ा देता है और वो यह है कि ये सभी सदस्य “मेड इन सेल” हैं।
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सोनल श्रीवास्तव, जो वर्तमान में आरसीएल में प्रबंधक पद पर कार्यरत हैं और ये भिलाई इस्पात संयंत्र में शामिल होने वाली तीसरी पीढ़ी के सदस्य हैं। श्री सोनल श्रीवास्तव कहते हैं कि “मैं अपने दादाजी से कभी नहीं मिला, उनकी मृत्यु जल्दी हो गई थी, लेकिन उनके संस्मरण आज भी हमें गौरवान्वित करते हैं”। सोनल के दादा जी ने बीएचयू से मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया था। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वह टाटा प्रोजेक्ट्स में शामिल हो गए थे, लेकिन नियति को तो कुछऔर ही मंजूर था। टाटा में अपने दो साल का कार्यकाल पूर्ण करने के बाद, वह बेहतर संभावनाओं के लिए मुंबई जा रहे थे, लेकिन यात्रा के बीच में ही वह एक ऐसी जगह पर रुके जो चारों ओर तंबू से घिरा हुआ था। जैसे ही वह स्टेशन से बाहर निकले, उनके पास एक नौकरी थी, जो तब अंजान भिलाई इस्पात संयंत्र की नौकरी थी। वह फाउंड्री और फोर्ज शॉप में शामिल हुए और उनकी उपलब्धि के लिए उन्हें 1971 में ‘मेटलर्जिस्ट ऑफ द ईयर’ सम्मान से सम्मानित किया गया।
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सोनल श्रीवास्तव ने कहा कि मेरे पिता भिलाई में पैदा हुए, यहीं पले-बढ़े और भिलाई विद्यालय में स्कूली शिक्षा प्राप्त कर, भिलाई इस्पात संयंत्र में सेवा देने वाले दूसरी पीढ़ी के कर्मचारी बने। इस संगठन में 39 साल की सेवा के बाद, वह ढेर सारी अच्छी यादों और गर्व की भावना के साथ, पिछले साल ही मर्चेंट मिल विभाग से सेवानिवृत्त हुए हैं।
श्री सोनल बताते हैं कि तीसरी पीढ़ी का सेल कर्मचारी होने के नाते, मैंने अपना मिडिल स्कूल बीएसपी ईएमएमएस-5 से और अपना हाई स्कूल बीएसपी के एसएसएस-10 से पूरा किया। एनआईटी रायपुर से मेटलर्जी में अपनी इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद, मैं वर्ष 2014 में सेल की कार्यसेवा में शामिल हो गया। एक कर्मचारी के रूप में भले ही अब तक मैंने यहाँ एक दशक ही बिताया हो, पर बीएसपी के साथ और सहयोग के कारण सेल हमेशा ही मेरे अस्तित्व का अभिन्न अंग रहा है।तीसरी पीढ़ी के एक और कर्मचारी और सीटीवाईएम के विजेता सदस्य सिद्धार्थ रॉय, वर्ष 2015 में भिलाई इस्पात संयंत्र में शामिल हुए और वर्तमान में ब्लास्ट फर्नेस-8 (ऑपरेशन) में प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं।
सिद्धार्थ रॉय का कहना है कि “सेल मेरे लिए नया नहीं है, बल्कि मेरे जीवन का एक हिस्सा है”। इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई और यहाँ की कड़ी मेहनत, ईमानदारी और बुद्धिमत्ता की मशाल आने वाली पीढ़ियों तक
भी पहुँची है। सेल में कार्य करने वालों में सबसे पहले मेरे दादाजी थे – एक साधारण दूरदर्शी व्यक्ति थे। उन्होंने न केवल अपना पैतृक घर और इस्को इस्पात संयंत्र (पूर्व में कुल्टी, पश्चिम बंगाल में स्थित) में नौकरी छोड़ दी, बल्कि अन्य लोगों को भी एक अविकसित, नई जगह पर जाने और वहां रहने के लिए मना लिया और वो सभी भिलाई चले आए। उन दिनों, भिलाई इस्पात संयंत्र एक मिलियन टन प्रतिवर्ष उत्पाउन क्षमता वाला संयंत्र था। अभी नया सेटअप होने के कारण, पूर्व सोवियत संघ (यूएसएसआर) टेक्नोलॉजी को आवश्यक रूप से सीखना सबसे महत्वपूर्ण होने के साथ साथ यहां के प्रत्येक कर्मचारियों का प्राथमिक उद्देश्य बन गया था। कंपनी विकसित हुई, उसके साथसे सीखना सबसे महत्वपूर्ण होने के साथ साथ यहां के प्रत्येक कर्मचारियों का प्राथमिक उद्देश्य बन गया था। कंपनी विकसित हुई, उसके साथ ही लोगों ने विकास किया और इस्पात श्रमिकों की पहली पीढ़ी धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। फिर मेरे पिता, वर्ष 1980 के दशक के मध्य में सेल में शामिल हुए। वह एक ऐसा समय था जब हमारा परिवार ‘ग्रोथ’ कर रहा था। संयंत्र की क्षमता पहले ही 2.5 मिलिटन टन प्रतिवर्ष तक बढ़ा दी गई, जो उस समय एक उल्लेखनीय और तकनीकी रूप से आष्चर्यजनक उपलब्धि थी। अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी वाली प्लेट मिल देखने लायक थी।
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