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: बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले....

बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले.... बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले। शायर की यह पंक्तियां राजधानी के एक नवरात्रि के गरबा आयोजन पर सटीक बैठती हैं। गरबे में चल रहे नाच-गाने के बीच कुछ नेता यह सोचकर पहुंच गए कि एक ही जगह प्रत्याशी को पहचान मिल जाएगी और समर्थन भी मांग लेंगे। मगर राजनेताओं को यह दांव तब उल्टा पड़ गया, जब समाज के प्रत्याशी के लिए टिकट मांग रहे समाज के नेताओं ने राजनेताओं को ठेंगा दिखा दिया और धकियाकर बाहर निकाल दिया, साथ ही कह गए कि राजनीति है, कल तक हम आपकी चौखट में सिर नवाने आए थे, एक प्रत्याशी ही तो मांग रहे थे, वह भी नहीं मिला, अब किस मुंह से समर्थन लेने आए हैं, नवरात्रि के इस आयोजन स्थल में भीतर गरबा चल रहा था, लोग नाच रहे थे, खुश थे और माता के जयकारे लग रहे थे, मगर राजनेता मुंह लटकाए शायर की पंक्तियां गुनगुना रहे थे।

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